संपादकीय
आदि अंत की संकल्पना से परे, केसरिया रंग की सूर्याभा निरन्तर सृष्टि को प्रकृति के अनुसार प्रकाशित करती चली आ रही है। यदि प्रातः काल की रश्मियाँ प्रकृति के प्रभापुंज का अंग और स्रोत है, तो निशाकाल की कालिमा की भी अपनी उपादेयता है। यह अवश्य है कि, यदि निशाकाल के तमस का कालखण्ड बढ़ने लगता है तो विभिन्न काया में आबद्ध आत्माएं प्रकाश की आकांक्षा में चीत्कार कर उठती है। अपनी भारत भूमि में भी पिछले लगभग तीस-चालीस वर्षों से तमस की कालिमा गहराती चली जा रही है, विसंगतियों का हिमालय ऊँचा उठता जा रहा है, किन्तु उसी हिमालय में भारतीय सनातन संस्कृत की आधुनिक विजय-गाथा की जड़ी बूटियाँ संजीवनी बनकर हमारे समक्ष उपस्थित हो रही हैं जो कि, आशा का संचार करती हैं। विगत कालखण्ड ने देव भूमि काश्मीर में माँ गिरिजा किट्टू को ‘ओम नमः शिवाय‘ कहते हुए क्रूर, पौशाचिक जेहादियों द्वारा, आरा मशीन पर काटे जाते हुए भी देखा है, तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सन् 2008 में बहस करते हुए अमर शहीद अधिवक्ता श्रीकांत अवस्थी जी को अवमानना में जेल भेजे जाने पर, अधिवक्ता स्वाभिमान के रक्षार्थ अपना अप्रतिम, (किन्तु सृष्टि का क्रूरतम) बलिदान देते हुए भी देखा है। उक्त अधिवक्ता श्रीकांत अवस्थी जी की हत्या का प्रकरण, व्यवस्था के मुँह पर कालिख पोतता हुआ, ए सी सी- 2010 पृष्ठ 61 जनवरी पार्ट-1, में दर्शित भी है।
‘केसरिया स्वर‘ भारतीय सनातन परम्परा के अनुसार रचनात्मक एवं सकारात्मकता का उत्सव मनाने का तो प्रयास करता रहेगा, किन्तु वह गलत पर रुदन की परम्परा का निर्माण नहीं करेगा।
आज के संदर्भों में हम देखते हैं कि, साधनों की संपन्नता एक ऐसी दीवार खड़ी करती जा रही है, जो साधनहीन आम जन के लिए जीवन यापन को दुरूह बनाती जा रही है, एक तरफ उन्हीं संवैधानिक अधिकारों से युक्त भारतीय नागरिक प्रतिदिन हजारों करोड़ रूपयों की आय एकत्र कर रहा है तो दूसरी तरफ उन्हीं अधिकारों से युक्त नागरिक दरिद्रता और विपन्नता को झेलते हुए आत्महत्या तक कर रहा है। यदि हम मुनष्य हैं तो ऐसी स्थितियों के समुचित सुधार के लिए हमें चिंतन करना पड़ेगा। हम मार्क्स की भाँति सर्वहरा और बुर्जुआ के संघर्ष में फँसकर आधुनिक युग का अभिशाप तो नहीं बनना चाहेंगे, किन्तु हम दीनहीन वनवासी, ऋषियों, ब्राह्मणों, आदिवासियों को साथ लेकर, भगवान राम की तरह अपने आत्मबल से अन्यायी रावणों की लंका में अपने ओज के हनुमान और शौर्य के अंगद को अवश्य भेजते रहेंगे, और वहाँ पहुंचेंगे भी, बदलाव के लिए।
अपने इस प्रेवशांक के जरिये हम यह भी स्पष्ट कर दें कि आजादी के संघर्ष के समय जब वैचारिक जंजीरों से अखबारों, पत्रिकाओं की धनुष पर सवार होकर विचार श्रृंखलाओं की ज्वालाएं, अंग्रेजी सत्ता के यूनियन जैक को भारत भूमि में जलाकर भस्म कर रही थी तो उन अखबारों और पत्रिकाओं के कर्णधार, अधिवक्ता, साहित्यकार, और बुद्धिजीवी ही थे न कि, सेठों की प्राईवेट लिमिटेड कंपनियाँ। हाँ इसमें कोई दो राय नहीं कि उस समय के अधिकाँश सेंठों और लक्ष्मीपुत्रों ने तत्कालीन क्राँति के ध्वजवाहकों को, पाश्र्व में रहकर, वंदनीय आर्थिक सहयोग दिया था, जिससे भारत भूमि स्वतंत्रता की ओर अग्रसर हो सकी। केसरिया स्वर को आशा है कि आज के कालखण्ड में भी कृपालु पाठको द्वारा ‘केसरिया स्वर‘ को हर संभव सहायता प्रदान की जायेगी। इसकी विज्ञापन की नियमावली भी इसी अंक में दी जा रही है, हमारा प्रयास यही रहेगा कि, सच के संघर्ष में हम जन-गण-मन के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए खड़े रहें, अपनी अंतिम साँसों तक डटे रहें। हम ‘स्वयमेव मृग्रेन्द्रता‘ के आत्मबल के साथ, ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।‘ की भावना के साथ आगे बढ़ने को संकल्पित हैं। अंत में मैं अपनी ही गजल की दो पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात को विराम दूँगा कि, ‘‘रावण को मारने का जो शौक़ पालते हैं, वनवास पर निकल कर जंगल खँगालते हैं।‘‘
शरद मिश्र 'सिंधु', अधिवक्ता
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