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केसरिया स्वर वर्ष १अंक२ दिनांक १६.१०.२२से३१.१०.२०२२, पृष्ठ ८
संपादकीय
आदि अंत की संकल्पना से परे, केसरिया रंग की सूर्याभा निरन्तर सृष्टि को प्रकृति के अनुसार प्रकाशित करती चली आ रही है। यदि प्रातः काल की रश्मियाँ प्रकृति के प्रभापुंज का अंग और स्रोत है, तो निशाकाल की कालिमा की भी अपनी उपादेयता है। यह अवश्य है कि, यदि निशाकाल के तमस का कालखण्ड बढ़ने लगता है तो विभिन्न काया में आबद्ध आत्माएं प्रकाश की आकांक्षा में चीत्कार कर उठती है। अपनी भारत भूमि में भी पिछले लगभग तीस-चालीस वर्षों से तमस की कालिमा गहराती चली जा रही है, विसंगतियों का हिमालय ऊँचा उठता जा रहा है, किन्तु उसी हिमालय में भारतीय सनातन संस्कृत की आधुनिक विजय-गाथा की जड़ी बूटियाँ संजीवनी बनकर हमारे समक्ष उपस्थित हो रही हैं जो कि, आशा का संचार करती हैं। विगत कालखण्ड ने देव भूमि काश्मीर में माँ गिरिजा किट्टू को ‘ओम नमः शिवाय‘ कहते हुए क्रूर, पौशाचिक जेहादियों द्वारा, आरा मशीन पर काटे जाते हुए भी देखा है, तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सन् 2008 में बहस करते हुए अमर शहीद अधिवक्ता श्रीकांत अवस्थी जी को अवमानना में जेल भेजे जाने पर, अधिवक्ता स्वाभिमान के रक्षार्थ अपना अप्रतिम, (किन्तु सृष्टि का क्रूरतम) ब...
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